भगवान का दूत

अनुप्रा  दुबे

 

एक सियार था। वह घने जंगल में रहता था। एक दिन जंगल में उसे एक पट्टा मिल गया। उस पर लिखा था, ‘‘चैंपियन”।

 

बस, सियार ने वह पट्टा अपने गले में लटका लिया और अपने को सियार का राजा घोषित कर दिया। पूरे जंगल में डुगडुगी पिटवा दिया, ‘‘उसे यह पट्टा भगवान ने दिया है। वह भगवान का विशेष दूत है।“

 

जंगल के सभी जानवर अनपढ़ थे। उस पट्टे पर लिखी भाषा को कोई पढ़ नहीं सका। खुद सियार भी पढ़ा-लिखा नहीं था, लेकिन उसने चालाकी से उस पट्टे का लाभ उठाना चाहा।

 

धीरे-धीरे उसने सभी जानवरों पर अपनी धाक जमा ली। सभी जानवर उसकी सेवा करने लगे। सभी जानवर उसकी बातें ध्यान से सुनते और उस पर अमल करते। कुछ दिनों बाद, सियार हर मामले में मनमानी करने लगा। जंगल के कुछ जानवर उसकी मनमानी से नाराज भी हो गए।

 

सियार एक दिन घूमते-घूमते एक गांव के नजदीक पहुंच गया। साथ में उसकी सियारिन भी थी। अचानक गांव के शिकारी कुत्तों ने उसे देख लिया और उस पर झपट पड़े। सियार समझ गया कि प्राण संकट में हैं। उसने भागने की तैयारी करते हुये सियारिन से कहा, “जितनी जल्दी हो भाग चलो, नहीं तो प्राण नहीं बचेंगे।“

 

सियारिन ने कहा, “इन कुत्तों को अपना पट्टा दिखा कर बता दो कि तुम भगवान के दूत हो।“

 

सियार ने भागते हुये उससे सिर्फ इतना कहा, ‘‘ऐसी बातें अपने लोगों में ही चल पाती हैं। अतः जितना तेज भाग सकती हो, भाग लो।“

 

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