जूते की सुनो, वो भी तो कुछ कहता है...

समीर लाल ‘समीर’

हम जूता हैं. एक समय में हम 14 साल तक अयोध्या की राजगद्दी पर विराजमान रहे हैं. वो तो उस जमाने के लोग हमारी भाषा नहीं समझते थे वरना हम तो चाहते थे कि राम जी वनवास ही में रहें और कभी न लौटें. दीया बाती के लिए उनका आना कोई जरूरी थोड़ी है, वो तो हम कोविड के आने पर भी जला लेते. कैसी दीवाली? चुनाव जीतने पर पटाखे फोड़ लेते.  

समय बदला, रामयुग से कलयुग में पहुँच गये. हमारा महत्व आज भी काफी हद तक बरकरार रहा. अच्छे जेन्टलमैन की पहचान उसके सूटेड बूटेड होने से की जाती है. इसमें जो बूटेड वाली बात है, वो हमारी हो रही है.

वाह, क्या फक्र की बात है. हर रुप में प्रतिष्ठित-पैर में रहूँ तो धारक का सम्मान और सर पर बजा दिया जाऊँ तो उसका अपमान. अब तो बहुत से लोग हो गये हैं जो सिर्फ हमारी भाषा ही समझते हैं. यह फर्क आ गया है आज के जमाने में.

रामाअसरे जी, जो आरक्षित कोटे से इस शहर के कलेक्टर हैं. कुछ अरसे पहले हम शहर की सबसे बड़ी दुकान से खरीद कर उनके लिये लाये गये. यह अलग बात है कि हमारा दाम दारु के ठेकेदार ने भरा और रामाअसरे जी ने बस हमारे आने से खुश होकर उनका एक ठेका पास कर दिया. यह तो उनकी आपसी समझबूझ है, उससे हमें क्या. हम तो रामाअसरे, कलेक्टर की पैर की शोभा बढ़ाने आ गये. रामाअसरे जी हमें पहन कर बड़ी शानोशौकत से दफ्तर गये. हमारे कारण उनके चेहरे पर आत्म विश्वास था. मातहतों की निगाहें हमें देख देख कर रश्क खाती थीं. दिन भर वो हमें पहनें कभी इस मीटिंग कभी उस मीटिंग. कभी यहाँ दौरे पर और कभी मंत्री जी के साथ गाँव की परिक्रमा. हमने उनके पग में भर सामर्थ सुविधायें बिछा दीं. हर कंकड़ की चुभन हमने झेली, हर धूल, कींचड़ को अपने शरीर पर ले लिया. धूप की जलन हमने झेली और रामाअसरे को महसूस भी नहीं होने दिया कि सड़क कितनी तप रही है. हर तकलीफ झेलते रहे ताकि रामाअसरे को कोई तकलीफ न हो और फिर शाम हो गई.

शाम को मंदिर में महाआरती में मंत्री जी को भाग लेना था सो रामाअसरे, कलेक्टर को साथ होना ही था और हम तो साथ थे ही. मगर यह क्या, जैसे ही मंदिर आया वो हमें बाहर ही छोड़ कर चल दिये. हम उनसे भी बड़े अछूत हो गये क्योंकि हम कलेक्टर नहीं. अरे, अगर अगर आरक्षण न होता तो अभी तो ये भी कहीं जूता ही सिल रहे होते. बहुत गुस्सा आया रामाअसरे पर. यही सब देखकर हमें लगता है कि यह हमारे लिये कितने गर्व की बात है-इन मानवों की संगत में लगातार रहते हुये भी हमने खुद को इनकी सभ्यता से बचा कर रखा. हमारे लिये तो क्या हिन्दु, क्या मुसलमान और क्या ईसाई, सब एक हैं. हम सबकी वैसे ही सेवा करते हैं और सबके साथ एक ही व्यवहार रखते हैं. आज तो रामाअसरे के बारे में खराब खराब विचार मन में आने लगे मगर क्या करते, वहीं पड़े रहे. फिर थोड़ी देर में रामाअसरे लौटे और हमें पहन कर फिर चल दिये. हमारा दिमाग तो सटका हुआ था ही, बस गुस्से मे काट खाये उनको. पूरे चव्वनी भर का छाला बनाया. घर पहूँच कर वो अपने नौकर पर गुस्साये. कहे कि कल हमें वापस दुकान ले जायें, जहाँ से हम लाये गये थे. हम तो डर ही गये.

खैर, हम डब्बे में रख कर दूसरे दिन वापस दुकान पर ले जाये गये. नौकर ने बढ़ चढ़ कर हमारी शिकायत लगाई. चव्वनी को अठ्ठनी बताया गया. दुकानदार ने हमें गुस्से में अलटाया पलटाया और अंदर ले गया. लोहे के बत्ते पर चढ़ाया और दो हथौड़ी मरम्मत कर दी. हमारी तो चीख ही निकल गई. फिर मोम मलहम लगा कर वापस भेज दिये गये कि अब नहीं काटेगा. इतनी जबरदस्त पिटाई के बाद काट भी कौन सकता है, कम से कम हम तो नहीं. अभी आदमी होने के गुण हममें आना बाकी हैं.

हम वापस आ गये. अब मंदिर में बाहर छोड़ दिये जाने की जलालत झेलना हम सीख चुके थे. कौन फिर फिर अपनी मरम्मत कराये- जूते हैं कोई नेता तो हैं नहीं. दिन बीतते गये. हम बिना अपनी बढ़ती उम्र और क्षीण होती शक्ति की परवाह किये बगैर, हर पल हर क्षण रामाअसरे की सेवा करते रहे. एक दिन गुस्से और बदहवासी में उन्होंने एक पत्थर पर ऐसी ठोकर मारी कि दर्द से हमारा जो मुँह खुला तो खुला ही रह गया. वो घर लौट आये. उनके लिये नया जूता आ गया. हम पीछे के कमरे के स्टोर में डाल दिये गये. हम अपनी हालात पर रोते रहे और नौकर हमें देख लालायित होता रहा. फिर एक दिन कलेक्टराईन से पूछ कर वो हमें अपने घर ले आया. जूते के डॉक्टर कल्लू मोची से हमारा इलाज करा कर उसने हमें अपनी अलमारी में बड़ी इज्जत से सजा लिया. अब वो हमे अपने विशिष्ट समयों में पहन कर गौरवान्वित होता है.

रामाअसरे से मुझे कोई शिकायत नहीं. मेरी ही तरह बल्कि मुझसे भी ज्यादा उसके लिये, अब बूढी हो चली उसकी माँ ने तकलीफें झेली थीं. बचपन में ही रामाअसरे के पिता गुजर गये थे. माँ ने मुहल्ले के कपड़े सी सी कर उसे पाला. हर तकलीफें खुद झेलीं मगर रामाअसरे को महसूस भी नहीं होने दिया. खुद भूखी रही, रामाअसरे को कभी अहसास नहीं होने दिया कि भूख क्या होती है. खुद लोगों के कपड़े सीती रही मगर रामाअसरे को नीचा न देखना पड़े इसलिये हमेशा अच्छे कपड़े पहनाये. अपनी तबियत की चिंता किये बिना, उसे पढ़ाया, लिखाया. कलेक्टर बनाया और आज वो माँ, उसी कलेक्टर के घर में पीछे वाले कमरे में रहती है. बेटे की कमायाबी से खुश हो लेती है.बेटे के पास समय नहीं है, बस माँ पीछे के कमरे से उसे दफ्तर जाते और देर रात लौटते देखकर संतुष्ट हो लेती है. उसकी पत्नी कीटी पार्टियों और सामाजिक कार्यों में व्यस्त रहती है. आज तो अखबार में कलेक्टराईन की वृद्धाश्रम में सेवा करते हुये तस्वीर भी छपी है. रामाअसरे के बच्चे अपनी दुनिया में ही खोये रहते हैं. दादी को प्यार और आदर देना है यह उनके माँ-बाप ने समयाभाव में कभी सिखाया ही नहीं और न ही उन्होंने सीखा. माता जी को बस नौकर कलेक्टर साहब की माँ होने की वजह से सम्मान देते हैं और वो उसी में संतुष्ट हैं. और करें भी क्या बेचारी. जीर्ण क्षीण काया लिये पड़ी रहती है.

तब फिर हम तो सिर्फ जूता हैं, हम क्यूँ न संतुष्ट रहें इस नौकर द्वारा दिये सम्मान से.

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