Life with Grand Parents

विशाल सरीन

आज का समाज एकल परिवार वाला हो गया है । पहले तो पता ही नहीं होता था कि किसी परिवार के सदस्य कितने है । घर की स्त्रियाँ सारा दिन चूल्हा चौका करती थी। परिवार में  इतने सदस्य होते थे  कि सुबह का नाश्ता हुआ नहीं कि दोपहर के खाने का समय हो जाता था और जब तक लंच कम्पलीट होता था, तो शाम की चाय का समय हो जाता । चाय पीते पता नहीं लगता था कि डिनर का समय हो गया । शायद रात को सोते समय भी घर की स्त्रियों को खाना बनाने के ही  सपने आते होंगे ।

आज की तारीख में घर के कुल तीन - चार सदस्य होते है । वो भी कामकाजी पति पत्नी नाश्ता अपने दफ्तर में करते हैं, लंच भी वहीं हो जाता है और घर वापसी पर डिनर का होम डिलीवरी के लिए आर्डर कर दिया जाता है । ऐसे ही स्कूल जाते बच्चे भी नाश्ता और दोपहर का खाना स्कूल में ही खा लेते हैं ।

पहले जहाँ गृहणियां अपने पति या बच्चों की पसंद के पकवान बनाती थी, कभी खीर तो कभी आलू पूरी - वाह स्वाद ही कुछ अलग था । पर आज की प्रोफेशनल लाइफ में किसी के पास इतना समय नहीं है। बना बनाया जो भी मिल गया अच्छा लगता है । वीक एन्ड पर भी सोचा जाता है कि किस होटल का खाना अच्छा होगा । चलो बच्चों को फिल्म दिखाएंगे और दोपहर का खाना खाकर , रात के लिए पैक भी करवा लेंगे ।

आजकल के ऐसे हालात में बहुत कम ही किस्मत वाले घर होंगे जहाँ बच्चो को दादा - दादी के साथ रहने को नसीब होता है । क्यूंकि कामकाजी लोगों की सोच रहती है कि इनके लिए खाना कौन बनाएगा, उनके कपड़े कौन धोएगा और उससे हटकर भी कुछ काम हो सकते है। इन् दिनों दादा - दादी की कहानियों का रिवाज़ भी बहुत कम हो गया है । बच्चे टीवी , फ़ोन, लैपटॉप में इतने व्यस्त हो गए हैं कि इन उपकरणों ने दुसरे पारिवारिक रिश्तों की भूमिका को फीका कर दिया है

इसमें बच्चों का इतना कसूर नहीं है जितना उनके माँ बाप का। बच्चों ने तो उस माहौल में जीना सीख लिया है जैसा उनको मिला है । हमने बच्चों की ज़िन्दगी में रिश्तों की कमी को पूरा करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस दे दिए है । यही कारण है कि आजकल बच्चों को बड़ों का आदर सत्कार करने के वो संस्कार नहीं होते जो होने चाहिए ।

पहले गर्मी की छुट्टियों में नाना नानी के पास जाने का बहुत प्रचलन था। स्कूल खत्म होते ही मामा लेने आ जाते थे और वापसी का समय तय होता था कि स्कूल खुलने के एक दिन पहले तक आ जाना। ग्रैंड पेरेंट्स को भी बच्चों के साथ समय बिता कर आंतरिक सन्तुष्टि का आभास होता है लेकिन आजकल उसकी जगह एडिशनल कोचिंग क्लासेस ने ले ली हैं । कुछ माँ बाप तो प्रयत्न करते है कि बच्चे को कम उम्र में ही स्कूल में भर्ती कर दे जिससे वो अति शीघ्र पढ़ाई शुरू कर सकें

कई बार माता पिता को कामकाज के लिए किसी दुसरे शहर अथवा देश में जाना पड़ता है | ऐसे हालत में बच्चे भी उनके साथ जाते हैलेकिन आज के टेक्नोलॉजी युग में दूर बैठे हुए भी एक दुसरे को देख कर बात की जा सकती है जिससे रिश्तों में निकटता और प्यार बना रहे जब भी संभव हो उनसे मिलने के लिए कुछ दिनों के लिए प्लान कर एक मूल्यवान समय व्यतीत करना चाहिए

जिन परिवारों को परमात्मा का आशीर्वाद होता है और दादा दादी के साथ रहने का अवसर प्रापत होता है वहां के बच्चो के संस्कार अलग से देखने को मिलते है । ऐसे परिवारों में कभी कभार माँ बाप को अपने बच्चों का दादा दादी के साथ रहने का मूल्य पता नहीं लगता । वो इसी ग़लतफहमी में रहते है कि जो अच्छे संस्कार बच्चों में हैं वो उन्ही ने दिए है और अगर बच्चे थोड़े बिगड़े है तो वो दादा दादी के कारण ।

बच्चों की ज़िन्दगी को हमने सिर्फ स्कूल की पढ़ाई या कोचिंग  क्लासेस तक सीमित कर दिया है । इससे उनका ज्ञान सिर्फ पढ़ाई गयी किताबों तक सिमट कर रह गया है । एक खुला माहौल जिसमे बच्चों  का सर्वांगीण विकास हो , उसको हमने अपने जीवन से निकाल दिया है ।

ग्रैंड पेरेंट्स की मह्त्ता को ज़िन्दगी से नकारा नहीं जा सकता । आज जो लोग माँ बाप है वो आने वाले समय में दादा दादी / नाना नानी बनेंगे और महसूस करेंगे कि सारी ज़िन्दगी जिन बच्चो के लिए मेहनत की, आज वो बच्चे उनके साथ रहने में हिचकिचाते है । आइये अपने कल को सँवारने के लिए आज बच्चों को जितना संभव हो उनके ग्रैंड पेरेंट्स के साथ समय बिताने दिया जाए । जिससे बच्चों का आने वाला समय साकार हो सके और साथ ही अपने माँ बाप की सेवा करने का मौका मिल सके ।


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