नैतिक, आध्यात्मिक शिक्षा क्यों और कैसे

राम अभिषेक  तिवारी 

भारतीय शिक्षा प्रणाली मैं आरम्भ से ही इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता  था की शिक्षा के द्वारा मनुष्य का जीवन श्रेष्ठ से श्रेष्ठता बकी ओर बढ़े।   कहा भी गया है "सा विद्या या विमुक्तये" अर्थात विद्या वही है जो मुक्ति प्रदान करे।  मुक्ति अज्ञान से, अन्धकार से, जीवन को अधोगति देने वाले विकारों से।  

इसलिए हमने आकांक्षा की "तमसो मा ज्योतिर्गमय"  अर्थात हम अन्धकार से प्रकाश की ओर बढ़ें। 

मात्र आजीविका या जीवन-यापन किसी शिक्षा का लक्ष्य नहीं हो सकता। यदि शिक्षा मनुष्य को मनुष्यता नहीं प्रदान करती, यदि शिक्षा मनुष्य के अंदर के दानव का शमन कर उसे मानव नहीं बनती, उसके मानवीय गुणों को संस्कारित नहीं करती तो वह शिक्षा निरर्थक है, दिशाविहीन है, व्यर्थ है, बोझ मात्रा है। 

अतः शिक्षा मूलतः नैतिक होनी चाहिए, नैतिक नीति शब्द से बना विशेषण है "नीयते इति  निति"  अर्थात जो आगे लेकर जाए वही निति है।  जिस शिक्षा का संबंध मनुष्य के सर्वांगीण विकास से हो, जो शिक्षा व्यक्ति, समाज और  संस्कृति   से सम्बन्ध और श्रेष्ठ तत्वों का पोषण करने वाली हो वह स्वाभाविक रूप से नैतिक  होगी। इसलिए वास्तविक तथा यथार्थ  शिक्षा मूलतः नैतिक होती है।  नैतिक शिक्षा का संबंध व्यक्ति के आचरण से है।  नैतिक शिक्षा व्यावहारिक होती  है,  इसका जीवन के प्रत्येक व्यवहार से गहरा संबंध  है। जब हम नैतिक शिल्षा के व्यावहारिक स्वरुप व् क्रियान्वयन की बात करते हैं तो यह सिद्धांत मुख्या रूप से ध्यान रखने योग्य है की शिक्षा जीवन जीने की कला है।  

नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा की इस व्यापकता एवं गहराई के कारण  बहुत अध्यापकों की यह प्रमुख समस्या होती है कि, इस विषय के अंतर्गत क्या पढायें।  इस विषय की   पाठ्य  सामग्री क्या हो तथा उसके स्त्रोत क्या हैं?  ऐसे अनेक प्रश्न अनेक बार शिक्षकों द्वारा उठाये जाते हैं।  अतः नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा का पाठ्यक्रम क्या हो तथा  उसका क्रियान्वन किस प्रकार हो इसका सविस्तार विचार करना आवश्यक है।  इस सम्बन्ध में देशभक्ति, आध्यात्मिकता एवं सद्विचार हमारे लिए दिशा-निर्देशक है।  

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